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Author: dindiaadmin

रामनवमी या रावणनवमी?

रामनवमी या रावणनवमी?

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रामनवमी या रावणनवमी? डॉ. वेदप्रताप वैदिक इस बार भारत में हमने रामनवमी कैसे मनाई ? हमने रामनवमी को रावणनवमी में बदल दिया। देश के कई शहरों और गांवों में एक समुदाय के लोग दूसरे समुदाय से भिड़ गए। यहां तक की जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के छात्र, जिन्हें देश में अत्यंत प्रबुद्ध माना जाता है, वे भी आपस में भिड़ गए। कई शहरों में लाठियां, ईंट और गोलियां भी चलीं। कुछ प्रदर्शनकारी पुलिस की ज्यादती के भी शिकार हुए। यह सब हुआ है, उसके जन्म दिन पर, जिसे अल्लामा इक़बाल ने ‘इमामे हिंद’ कहा है। इकबाल का शेर है- है राम के वजूद पे हिंदोस्तां को नाज़। अहले-नज़र समझते हैं इसको इमामे हिंद!! राम को भगवान भी कहा जाता है और मर्यादा पुरुषोत्तम भी। लेकिन राम के नाम पर कौनसी मर्यादा रखी गई? राम को सांप्रदायिकता के कीचड़ में घसीट लिया गया। इसके लिए हमारे देश के वामपंथी और दक्षिणपंथी तथा हिंदू और मुसलमान, दोनों जिम्मेद...
भारत में आईएएस अधिकारियों की कमी, संघवाद की पवित्रता पर सवाल

भारत में आईएएस अधिकारियों की कमी, संघवाद की पवित्रता पर सवाल

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भारत में आईएएस अधिकारियों की कमी, संघवाद की पवित्रता पर सवाल -सत्यवान 'सौरभ' भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) (कैडर) नियम 1954 आईएएस अधिकारियों की विभिन्न राज्य सेवाओं से संबंधित है। ये अधिकारी राज्य और केंद्र दोनों की सेवा करते हैं। आईएएस (कैडर) नियम के तहत कुछ राज्य संवर्ग के अधिकारी कुछ वर्षों की सेवाओं को पूरा करने के बाद केंद्र सरकार की सेवाओं के लिए प्रतिनियुक्त होते हैं। हालाँकि, हाल के वर्षों में राज्य संकट पैदा करने वाली मौजूदा रिक्तियों के अनुसार केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए आवश्यक अधिकारियों की संख्या प्रदान करने में विफल रहे हैं। 1991 के उदारीकरण के बाद आईएएस अधिकारियों की वार्षिक भर्ती में भारी कमी के चलते 1991 से पहले के स्तर पर बहाल करने में केंद्र को लगभग 20 साल लग गए। 1 जनवरी, 2021 तक, अखिल भारतीय स्तर पर आईएएस अधिकारियों की कमी 23% थी। राज्य सिविल सेवा अधिकारियों का ...
पाक अधिकृत कश्मीर का ख़ौफ़नाक सच

पाक अधिकृत कश्मीर का ख़ौफ़नाक सच

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पाक अधिकृत कश्मीर का ख़ौफ़नाक सच विनीत नारायण ‘द कश्मीर फ़ाइल्ज़’ में जो दिखाया गया है वो उस ख़ौफ़नाक सच के सामने कुछ भी नहीं है जो अब अमजद अय्यूब मिर्ज़ा ने पाक अधिकृत कश्मीर में हुए हिंदुओं के वीभत्स नरसंहार के बारे में केलिफ़ोरनिया के अख़बार में प्रकाशित किया है। अय्यूब मिर्ज़ा ने पिछले महीने 21 मार्च को प्रकाशित अपने लेख में ‘द कश्मीर फ़ाइल्ज़’ को एक दमदार फ़िल्म बताते हुए इस बात की तारीफ़ की है कि कैसे इस फ़िल्म ने पाकिस्तान समर्थित जिहादियों और श्रीनगर के स्थानीय कट्टरपंथियों के आतंक को रेखांकित किया गया है। इस लेख में मिर्ज़ा लिखते हैं कि ये तो प्याज़ की पहली परत उखाड़ने जैसा है। उनके अनुसार जम्मू कश्मीर से अल्पसंख्यक हिंदुओं व सिखों को मारने और भगाने का सिलसिला 1990 से ही नहीं शुरू हुआ। इसकी जड़ें तो 1947 के भारत-पाक बँटवारे के अप्रकाशित इतिहास में दबी पड़ी हैं। अमजद अय्यूब मिर्...
अंग्रेजी नहीं, हिन्दी हो सम्पर्क भाषा

अंग्रेजी नहीं, हिन्दी हो सम्पर्क भाषा

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अंग्रेजी नहीं, हिन्दी हो सम्पर्क भाषा - ललित गर्ग- केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने सशक्त भारत-निर्माण के लिए भारतीय भाषाओं के प्रयोग की प्रासंगिकता व्यक्त करते हुए कहा कि जब अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले राज्यों के लोग आपस में बातचीत करें तो उन्हें अंग्रेजी के बजाय हिन्दी को या देश की ही किसी अन्य भाषा को इसका माध्यम बनाना चाहिए।’ निश्चित ही बातचीत एवं व्यवहार की भाषा के रूप में हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं का प्रयोग करने से राष्ट्रीय विकास के नए क्षितिज खुलेंगे, नवाचार के नए-नए आयाम उभरेंगे। भारतीय भाषाओं में बातचीत, व्यवहार, चिंतन एवं शिक्षण से सृजनात्मक एवं स्व-पहचान की दिशाएं उद्घाटित होगी। वास्तव में स्व-भाषाएं विचारों, विचारधाराओं, कल्पनाओं और अपने व्यापक सामाजिक-राष्ट्रीय दर्शन की स्पष्टता का माध्यम बनती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा नई राष्ट्रीय शिक्षा न...
मातृत्व की कला बच्चों को जीने की कला सिखाना है’।

मातृत्व की कला बच्चों को जीने की कला सिखाना है’।

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मातृत्व की कला बच्चों को जीने की कला सिखाना है'। (माँ अपने बच्चे के चेहरे पर पहली मुस्कान देखती है।) --प्रियंका 'सौरभ' यह एक सर्वविदित तथ्य है कि पांच साल से कम उम्र के बच्चे के लिए सबसे अच्छी उम्र होती है क्योंकि वह इस उम्र में सबसे ज्यादा सीखता है। एक बच्चा पांच साल से कम उम्र के घर पर ज्यादातर समय बिताता है और इसलिए वह घर पर जो देखता है और देखता है उससे बहुत कुछ सीखता है। छत्रपति शिवाजी को उनकी माँ ने बचपन में नायकों की कई कहानियाँ सुनाईं और वे बड़े होकर कई लोगों के लिए नायक बने। घर पर ही एक बच्चा सबसे पहले समाजीकरण सीखता है। एक बच्चा पहले घर पर बहुत कुछ सीखता है। लेकिन आज, चूंकि अधिकांश माता-पिता कमाने वाले व्यक्ति हैं, इसलिए वे अपने बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय नहीं बिता सकते हैं। बच्चों को प्ले स्कूलों में भेजा जाता है और अक्सर उनके दादा-दादी द्वारा उनका पालन-पोषण किया जाता...
आईआईएससी और मेलबर्न विश्वविद्यालय शुरू करेंगे संयुक्त पीएचडी

आईआईएससी और मेलबर्न विश्वविद्यालय शुरू करेंगे संयुक्त पीएचडी

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आईआईएससी और मेलबर्न विश्वविद्यालय शुरू करेंगे संयुक्त पीएचडी नई दिल्ली, 08 अप्रैल (इंडिया साइंस वायर): भारत के अग्रणी शोध संस्थानों में शामिल भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) और शिक्षण एवं शोध में 160 वर्षों का अनुभव रखने वाला ऑस्ट्रेलिया का मेलबर्न विश्वविद्यालय विज्ञान और प्रौद्योगिकी में संयुक्त पीएच.डी. कार्यक्रम शुरू कर रहे हैं। इन दोनों संस्थानों ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी में पहली बार संयुक्त पीएचडी कार्यक्रम के लिए हाथ मिलाया है, जिसे निकट भविष्य में मेडिकल पीएच.डी. कार्यक्रमों तक बढ़ाया जा सकता है। संयुक्त पीएच.डी. कार्यक्रम के विस्तार पर चर्चा के लिए आईआईएससी परिसर में दोनों संस्थानों के प्रतिनिधियों की बैठक हुई है। यह पीएच.डी. कार्यक्रम मेलबर्न इंडिया पोस्ट ग्रेजुएट एकेडमी (एमआईपीए) का हिस्सा है, जिसमें स्थापित शोधकर्ताओं और मेलबर्न विश्वविद्यालय तथा भारत के शीर्ष अनुसंधान...
महावीर है आत्म-क्रांति के वीर महापुरुष

महावीर है आत्म-क्रांति के वीर महापुरुष

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महावीर है आत्म-क्रांति के वीर महापुरुष - ललित गर्ग - महावीर का संपूर्ण जीवन स्व और पर के अभ्युदय की जीवंत प्रेरणा है। लाखों-लाखों लोगों को उन्होंने अपने आलोक से आलोकित किया है। इसलिए महावीर बनना जीवन की सार्थकता का प्रतीक है। महावीर बनने का अर्थ है स्वस्थ जीवन जीना, रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास करना। प्रत्येक वर्ष हम भगवान महावीर की जन्म-जयन्ती मनाते हैं, लेकिन इस वर्ष उस महान् आत्म-क्रांति के वीर महापुरुष की जयंती को कोरा आयोजनात्मक नहीं बल्कि प्रयोजनात्मक स्वरूप देना है। इसकेे लिये हर व्यक्ति अपने भीतर झांकने की साधना करें, महावीर को केवल पूजे ही नहीं हैं, बल्कि जीवन में धारण कर लें। जरूरी है कि हम महावीर ने जो उपदेश दिये उन्हें जीवन और आचरण में उतारें। हर व्यक्ति महावीर बनने की तैयारी करे, तभी समस्याओं से मुक्ति पाई जा सकती है। महावीर वही व्यक्ति बन सकता है जो लक्ष्य के प्रति पूर्ण...
तो हिन्दी से दूर जाती कांग्रेस

तो हिन्दी से दूर जाती कांग्रेस

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तो हिन्दी से दूर जाती कांग्रेस आर.के. सिन्हा देश के आठ पूर्वोतर राज्यों के सभी स्कूलों के दसवीं कक्षा तक में पढ़ने वाले बच्चों को हिन्दी अनिवार्य रूप से पढ़ाने पर वहां के सभी राज्य सरकारें राजी हो गईं हैं I 22 हजार हिन्दी के अध्यापकों की भर्ती की जा रही है तथा नौ आदिवासी जातियों ने अपनी बोलियों की लिपि देवनागरी को स्वीकार कर लिया है। क्या इन जानकारियों में आपको कहीं हिन्दी को थोपने के संकेत मिलते हैं? लेकिन, कांग्रेस तो कम से कम यही मानती है। कांग्रेस के नेता यह कहते हैं कि सरकार महंगाई तथा बेरोजगारी जैसे गंभीर मसलों पर बात करने की बजाय हिन्दी को गैर-हिन्दी भाषियों पर थोपने की चेष्टा कर रही है। दरअसल विगत दिनों केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उपर्युक्त जानकारियां देश के साथ सांझा की थीं। उसके बाद कांग्रेस के नेता जयराम रमेश और अभिषेक मनु सिंघवी मैदान में उतर आए। जयराम रमेश ने ज्ञान ...
तृतीय विश्व युद्ध की पहल करता यूक्रेन – रूस युद्ध

तृतीय विश्व युद्ध की पहल करता यूक्रेन – रूस युद्ध

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तृतीय विश्व युद्ध की पहल करता यूक्रेन - रूस युद्ध या विश्व के स्थाई भविष्य के लिए चेतावनी है यूक्रेन - रूस युद्ध डॉ. शंकर सुवन सिंह यूक्रेन की सीमा पश्चिम में यूरोप और पूर्व में रूस से जुडी है। द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) खत्म होने के बाद दुनिया दो गुटों में बंट गई थी। एक तरफ अमेरिका और दूसरी तफर सोवियत संघ था। यूक्रेन वर्ष 1991 से पहले सोवियत संघ का हिस्सा था। 25 दिसंबर 1991 को सोवियत संघ टूट गया और 15 अलग-अलग देश बन गए। ये 15 मुल्क हैं- यूक्रेन, आर्मीनिया, अजरबैजान, बेलारूस, इस्टोनिया, जॉर्जिया, कजाकिस्तान, कीर्गिस्तान, लातविया, लिथुआनिया, मालदोवा, रूस, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान। यूक्रेन ने वर्ष 1991 में अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा की थी। 1991 में यूक्रेन के अलग होने के बाद से दोनों देशों के बीच विवाद शुरू हो गया था। रुसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को 1991 में सोव...
स्थाई भविष्य के लिए चेतावनी है यूक्रेन – रूस युद्ध

स्थाई भविष्य के लिए चेतावनी है यूक्रेन – रूस युद्ध

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स्थाई भविष्य के लिए चेतावनी है यूक्रेन - रूस युद्ध डॉ. शंकर सुवन सिंह दो देशों का युद्ध, अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का शिकार होता है। सामान संस्कृति, सभ्यता एवं भाषा वाले देश आपस में लड़ रहे हैं। जो देश कभी एक हुआ करते थे वो आज एक दूसरे के दुश्मन बने हुए हैं। जो देश जिस देश के निकट हैं वो एक दूसरे के प्रति उतनी ही विकटता पैदा करते हैं। यह कहने में अतिश्योक्ति नहीं होगी कि अत्यधिक निकटता विकृति को पैदा करती है। भगवान् विष्णु के नवें अवतार महात्मा गौतम बुद्ध ने कहा था - वीणा के तारों को इतना भी मत कसो कि वह टूट जाये और इतना ढीला भी मत रखो कि उससे सुर ही न निकले। कहने का तात्पर्य अति किसी भी चीज कि बुरी होती है। चाहे वह निकटता हो या दूरी हो। प्रत्येक देश को संतुलित रहने कि जरुरत है। संतुलन ही किसी भी समाधान का मूल मंत्र है। प्रतिस्पर्धा हमेशा उससे ही होती है जिसके बारे में हम जानते हैं या जिसस...