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The unbridled audacity of our babus

The unbridled audacity of our babus

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The Indian bureaucracy is notorious for inventing outrageous ways of self-aggrandisement. However, nothing demonstrates its unbridled audacity for disregarding all civilised norms of probity than the disreputable Non Functional Upgrade (NFU) scheme. One must doff one’s hat to the ingenuity of the bureaucracy to loot the nation. Simultaneously, the political leadership needs to be pitied for a total lack of spine to check this blatant delinquency. Bureaucracy rules the roost.   The Sixth Central Pay Commission, in its March 2008 report, recommended introduction of NFU to reward civil servants of 49 ‘Organized Central Group A Civil Services’ with automatic time-bound pay promotions till the Higher Administrative Grade. Subsequently, it was made applicable to the IPS and the Indian...
Maulik Bharat members write a Complaint to ECI Regarding : Compulsion to cast NOTA vote on 11 February 2017

Maulik Bharat members write a Complaint to ECI Regarding : Compulsion to cast NOTA vote on 11 February 2017

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सम्मानित साथियों, सादर प्रणाम। आशा है आप स्वस्थ व सानन्द होंगे। देश का चुनाव आयोग निकम्मा है और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने में अक्षम। न तो वो पैसों के खेल से चुनावो को निकाल पा रहा है और न ही उम्मीदवारों के शपथ पत्रों की जांच की उसके पास कोई व्यवस्था है, ऐसे में मैं किस उम्मीदवार को वोट दूँ? मेरा लोकतंत्र में पूरा भरोसा है किंतू इसकी कमजोरियों को दूर करने के लिए बड़े स्तर पर चुनाव सुधारों की आवश्यकता है। आज मैंने और मौलिक भारत के साथियों नीरज सक्सेना, संजीव गुप्ता और घनश्याम जी ने नोटा का बटन दबाकर वर्तमान चुनावी तंत्र की खामियों के प्रति अपना विरोध दर्ज किया है। हम चुनाव आयोग को अपने वोटर पहचान पत्र सहित एक प्रतिवेदन भेज रहे हैं। हम मौलिक भारत के माध्यम से चुनाव आयोग और चुनाव प्रणाली में सुधार और सच्चे लोकतंत्र की स्थापना के लिए अपना संघर्ष जारी रखेंगे। To, The Chief El...
Vigil necessary on excessive cash-withdrawal from bank-accounts

Vigil necessary on excessive cash-withdrawal from bank-accounts

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Study should be made about quantum of cash-withdrawals after lifting of cash-withdrawal limit from current-accounts in banks. It is also necessary because Reserve Bank of India (RBI) has announced removing all restrictions on cash-withdrawals even from savings-accounts in banks from 13.03.2017.   In an era when central government is trying, and rightly so, for a cashless economy, there needs to be proper check on excessive cash withdrawals from bank-accounts to prevent re-emergence of parallel economy of black money and hawala-operations. Income Tax Department can ask banks to provide details of bank-accounts and PAN-numbers where cash-withdrawal in a month has exceeded some stipulated limit. Auditors can be required to mention in their audit-reports about purpose of such heavy ...
‘paytm’ aunt-nephew TV-advertisement not in good taste

‘paytm’ aunt-nephew TV-advertisement not in good taste

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It refers to ‘paytm’ TV-advertisement showing a child getting cash-gift through ‘paytm’ on his mobile-phone from his aunt despite specific directions from his mother for not accepting any such cash-gift from the aunt. This advertisement while portraying the child as a greedy nephew, also wrongly educates a child to disobey his mother behind her back even after assuring his mother about obeying her. Union Ministry of Information and Broadcasting, The Advertising Standards Council of India, Union Ministry for Child Development and National Commission for Protection of Child Rights (NCPCR) should take necessary steps to stop airing the said TV advertisement. SUBHASH CHANDRA AGRAWAL
Big Brother is winning

Big Brother is winning

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The clamour for security, accountability and transparency is leading to unfettered increase in the power of states. We are enacting law after law, introducing technology after technology, to render citizens transparent to the state. But at the same time, we are weakening protections and consenting to technologies in a way that makes the state less transparent to us. Totalitarian states often do this against the wishes of their citizens; in our democracy, our consent is being mobilised to put an imprimatur over more control and arbitrariness. And in a fit of distraction, we have come to believe that giving the state more powers will conjure up all the goodies we need. All it will produce is a disciplinarian society more under the state’s control. Just witness the latest exhibit. The Fina...
राहुल- प्रियंका का खर्च आप क्यों उठाएं?

राहुल- प्रियंका का खर्च आप क्यों उठाएं?

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कुछ माह पहले राजधानी के आरटीआई एक्टिविस्ट आशीष भट्टाचार्य की एक आरटीआई  का जो जवाब भारत सरकार  ने दिया से पता चला कि प्रियंका गांधी को लुटियन दिल्ली के 35 लोधी एस्टेट के शानदार बंगले का मासिक किराया मात्र 8,888 रुपये ही देना पड़ता है। यह छह कमरे और दो बड़े हालों का विशाल बंगला है। कई एकड़ में फैला है। ऊंची दीवारें हैं। जगह-जगह सुरक्षा पोस्ट बने हुए हैं। सुरक्षा प्रहरी २४ घंटे तैनात रहते हैं। यह भी ठीक है कि उनकी भी सुरक्षा अहम है। वे कम से कम नेहरु-गाँधी परिवार की वंशज तो हैं ही। पर उनसे इतना कम किराया क्यों लिया जा रहा है? इतने कम किराए पर राजधानी में एक कमरे का फ्लैट मिलना भी कठिन है। और जब प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा का अपना सैंकड़ों करोड़ का लंबा-चौड़ा कारोबार है। वे स्वयं सक्षम हैं, तो फिर उनसे इतना कम किराया सरकार क्यों लेती है। जाहिर है, देश की जनता को इस सवाल का जवाब तो चाहिए ही।...
जंग-ए-आज़ादी का दूसरा सबसे बड़ा बलिदान था तारापुर गोलीकांड

जंग-ए-आज़ादी का दूसरा सबसे बड़ा बलिदान था तारापुर गोलीकांड

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    भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा आते ही हमें याद आता है ‘बलिदान’ | मूछों पर ताव देते पंडित चंद्रशेखर आज़ाद, पगड़ी पहने सरदार भगत सिंह, जलियांवाला बाग में अंग्रेजों की गोलियों से गिरते लोग ये सभी दृश्य कौंधने लगते हैं मन में | एक ऐसा ही रोमांचित कर देने वाला घटनाक्रम आज आपसे साझा करना चाहता हूँ | इतिहास की स्मृति में धुंधला से गए कुछ पन्नों का पुनर्पाठ करना चाहता हूँ ताकि भारत की आन-बान-शान के लिए कुर्बान हो गए उन वीरों का ऋण चूकाने की कोशिश कर सकें | यह कहानी है बिहार के मुंगेर जिला अंतर्गत “ तारापुर थाना “ की, जहाँ 15 फरवरी 1932 की दोपहर सैकड़ों आजादी के दीवाने तिरंगा लहराने निकल पड़े | ब्रिटिश साम्राज्य के  यूनियन जैक की जगह राष्ट्रीय ध्वज “तिरंगा “ फहराने के उन्माद में तारापुर के अमर सेनानियों का दल हाथों में झंडा और होठों पर वंदे मातरम की गूंज लिए आगे बढ़ रहा थ...
पर्यावरण एवं विस्थापन राजनैतिक पार्टियों का मुद्दो से गायब है!

पर्यावरण एवं विस्थापन राजनैतिक पार्टियों का मुद्दो से गायब है!

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उत्तराखंड के लोग अपना पांचवा राज्य विधानसभा चुनने जा रहे है। हमने पाया कि बांध व अन्य बड़ी परियोजनायें, खदान, शराब, बेरोजगारी, पर्यटन, इत्यादि के कारण हो रहा विस्थापन का वास्तविक मुद्दे है। ये सब राजनैतिक पार्टियों के एजेंडा में शामिल नहीं है। जून 2013 की त्रासदी से प्रभावित लोग अभी भी ठीक तरीके से ना बसाये गये है ना ही सभी को क्षतिपूर्ति मिली है। इन सब  मुद्दों के अलावा, वे उन मुद्दों को उठा रहे है जो की अस्तित्व में ही नहीं है और न ही उत्तराखंड के लोगों एवं हरे-भरे वातावरण संबघी रोजाना की समस्याओं को हल कर सकेंगें। उत्तराखंड एक हरा-भरा, नदियों खासतौर से राष्ट्रीय नदी गंगा और पांचधाम (बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री, और हेमकुंड साहिब) वाला हिमालयी राज्य है। कोई भी राजनैतिक पार्टी, यहाँ के स्रोतों से बड़े लोगों को छोड़कर, स्थानीय लोगो का भला करने वाले, विकास के रोडमैप के साथ नहीं ...
चुनावी अनुष्ठान में अनिवार्य मतदान जरूरी क्यों?

चुनावी अनुष्ठान में अनिवार्य मतदान जरूरी क्यों?

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उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा, मणिपुर के विधानसभा चुनावों में एक बार फिर मतदाता को अपने भाग्य का फैसला करने का अधिकार मिला है। यदि मतदाता सशक्त  और स्वस्थ लोकतंत्र चाहता है तो उसे कम-से-कम मतदान में उत्साह का प्रदर्शन करना होगा और अधिकतम मतदान को संभव बनाना होगा। मतदान के प्रति मतदाता की उदासीनता ने ही लोकतंत्र को कमजोर बनाया है। अनेक मोर्चाें पर अधिकतम मतदान के लिये प्रयास किये जा रहे हैं, विशेषतः युवापीढ़ी इसके लिये जागरूक हुई है यह एक शुभ संकेत है। यही कारण है कि विधानसभा चुनावों के पहले चरण में पंजाब और गोवा में क्रमशः 78.6 और 83 प्रतिशत मतदान हुआ। इसके लिए चुनाव आयोग और ‘आओ मतदान करे’-अभियान से जुडे़ विभिन्न पक्ष बधाई के पात्र है। चुनाव आयोग को तो इसके लिये व्यापक प्रयत्न करने ही होंगे, जैसाकि इस बार उसने गोवा में पहली बार मतदान करने वाली लड़कियों को टैडी बियर और लड़कों को पेन बां...
हिंदू फारसी तो दलित गैर संवैधानिक शब्द

हिंदू फारसी तो दलित गैर संवैधानिक शब्द

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आज हमारे देश में दो शब्दों को लेकर समाज में एक बड़ी भ्रांति फैली हुई है। पहला हिंदू और दूसरा दलित। ये दोनों शब्द समाज की संरचना में दो विपरित ध्रुव के वाहक के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए है। दो अलग-अलग ध्रुवों की पहचान के चलते ही ये दोनों शब्द न केवल समाजगत बाधाओं में उलझे हुए है बल्कि समय-समय पर विवाद के रूप में भी सामने आए है। इसके इतर इन शब्दों की समाज के अलग- अलग वर्ग और दायरों में (दलित-गैर दलित ) अपना स्थान है। दलित शब्द की पहचान भारत के संदर्भ में ख्यात है तो हिंदू शब्द की पहचान हिंदुस्तानी संदर्भ। ऐसा मेरा मानना नही है बल्कि यह समाज में प्रचलित मान्यताओं के आधार पर अपनी पहचान बनाए हुए है। हालाकि यह एक सच भी हो सकता है क्योंकि आज हमारा देश दो वर्ग व दो विचारधाराओं में बट़ा हुआ है। एक विचारधारा उस भारत की पक्षधर है जो गरीबी, गैर बराबरी, सामाजिक समानता और सामाजिक न्याय की पक्षधर है वो...