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स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर की पुण्य तिथि

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर की पुण्य तिथि

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26 फरवरी 1966 : पूरा जीवन तिहरे संघर्ष में बीता : दोहरा आजीवन कारावास --रमेश शर्मा स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर अकेले ऐसे बलिदानी क्राँतिकारी हैं जिन्हें दो बार आजीवन कारावास हुआ, उनका पूरा जीवन तिहरे संघर्ष से भरा है । एक संघर्ष राष्ट्र की संस्कृति और परंपरा की पुनर्स्थापना के लिये किया । दूसरा संघर्ष अंग्रेजों से मुक्ति केलिये । और तीसरा संघर्ष भारत के अपने ही बंधुओं के लांछन के झाँछन झेलने का।भारत यदि आक्रांताओं से पराजित हुआ और दासों का दास बना तो यह विदेशियों की शक्ति सामर्थ्य से नहीं अपितु अपने ही लोगों के असहयोग और ईष्या से बना । ये दोनों बातें सावरकर जी ने जीवन भर झेली । उनका संघर्ष सत्ता के लिये नहीं था, राजनीति के लिये नहीं था अपितु भारत राष्ट्र की अस्मिता और हिन्दु समाज के जागरण के लिये था । उनका और उनके परिवार का पूरा जीवन भारत के स्वत्व की प्रतिष्ठापना के लिय...
बाइडन की यूक्रेन-यात्रा

बाइडन की यूक्रेन-यात्रा

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की यूक्रेन-यात्रा ने सारी दुनिया को आश्चर्यचकित कर दिया है। वैसे पहले भी कई अमेरिकी राष्ट्रपति जैसे जाॅर्ज बुश, बराक ओबामा और डोनाल्ड ट्रंप एराक और अफगानिस्तान में गए हैं लेकिन उस समय तक इन देशों में अमेरिकी फौजों का वर्चस्व कायम हो चुका था लेकिन यूक्रेन में न तो अमेरिकी फौजें हैं और न ही वहां युद्ध बंद हुआ है। वहां अभी रूसी हमला जारी है। दोनों देशों के डेढ़ लाख से ज्यादा सैनिक मर चुके हैं। हजारों मकान ढह चुके हैं और लाखों लोग देश छोड़कर परदेश भागे चले जा रहे हैं। यूक्रेन फिर भी रूस के सामने डटा हुआ है। आत्म-समर्पण नहीं कर रहा है। इसका मूल कारण अमेरिका का यूक्रेन को खुला समर्थन है। अमेरिका के समर्थन का अर्थ यही नहीं है कि अमेरिका सिर्फ डाॅलर और हथियार यूक्रेन को दे रहा है, उसकी पहल पर यूरोप के 27 नाटो राष्ट्र भी यूक्रेन की रक्षा के लिए कम...
वैदिक साहित्य में सामाजिक समरसता

वैदिक साहित्य में सामाजिक समरसता

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~~~~~~~~~ भारतीय साहित्य का जहाँ से उद्गम हुआ, वह स्रोत निर्विवाद रूप से वेद है। वेद आर्ष काव्य की श्रेणी में आते हैं। हमारे प्राचीन ऋषि मनुष्य थे, समाज के साथ थे। वे आपसी प्रेम और सद्भाव को सबसे अधिक मूल्यवान समझते थे। इसीलिए मनुष्य की जिजीविषा, उसके सामाजिक सरोकार और समाजिक जीवन की योजनाओं के सुंदर चित्र वेदों में से बार-बार झाँकते हुए दिखाई पड़ते हैं। सर्वप्रथम वैदिक ऋषियों ने ही उस सामाजिक समरसता की परिकल्पना की, जो परवर्तीकाल में हमें भारतीय साहित्य की आत्मा के रूप में पहचान में आती है। ऋग्वेद के सबसे अंत में जो समापन-गीत है, उस पर हमारा ध्यान जाता है। यह सामाजिक समरसता का पहला गीत है, जो सदियों से समवेत स्वर में गाया जाता है। गीत इस प्रकार है- सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते।।समानो मन्त्र: समिति: समानीसमानं मनः सह चित्तमेषाम्।समा...
पाकिस्तान सम्भले अन्यथा आत्मविस्फोट निश्चित है

पाकिस्तान सम्भले अन्यथा आत्मविस्फोट निश्चित है

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-ः ललित गर्ग :- पाकिस्तान और चीन दुनिया के दो ऐसे विध्वंसक देश है, जिन्होंने आतंकवाद, युद्ध एवं पडोसी देशों में अशांति फैलाने की राहों को चुनते हुए अपनी बर्बादी की कहानी खुद लिखी है। पाकिस्तानी नेतृत्व ने ही भारत में आतंकवाद फैला कर लिखी अपनी बर्बादी की दास्तां, जिसे अब अब जनता झेल रही है।  रोटी, सब्जी, घी, तेल, दूध की महंगाई, बिजली, पानी, पेट्रोल, यातायात के आसमान छूते दामों ने पाकिस्तानियों के मुंह से निवाला ही नहीं छीना है, बल्कि उन्हें देश छोड़ने पर विवश कर दिया है। पाकिस्तान की हुकूमत दिवालिया होने से बचने के लिए अपनी अधिकतम कोशिशें करते हुए दुनिया के लगभग सभी के आगे हाथ फैला चुकी है, अब आगे रास्ता नजर नहीं आता। संभवतः पाकिस्तान के हालात सुधरने के बजाय दिनोंदिन बिगड़ते ही जा रहे हैं, कहीं से कोई आशा की उम्मीद दिखायी नहीं देती है। भारत ने कई बार दोहराया है कि आतंकवाद को बढ़ावा...
कर्मचारी लगते टेंशन, नेताओं को कई पेंशन।

कर्मचारी लगते टेंशन, नेताओं को कई पेंशन।

BREAKING NEWS, TOP STORIES, विश्लेषण
देश के अर्थशास्त्री और राजनेता पुरानी पेंशन योजना को लेकर जो बयान दे रहे हैं, वह तर्कसंगत नहीं है। क्योंकि राज्य के विधायक और सांसद खुद कई-कई पेंशन ले रहे हैं। जबकि एक कर्मचारी जो साठ साल देश की सेवा करता है उसकी पेंशन बंद कर दी गयी है, क्यों ?  नई और पुरानी पेंशन योजना का कर्मचारियों की पेंशन पर बड़ा अंतर है। इसे ऐसे समझें कि अगर अभी 80 हजार रुपये सैलरी पाने वाला कोई शिक्षक रिटायर होता है तो पुरानी पेंशन योजना के हिसाब से उसे करीब 30 से 40 हजार रुपये की पेंशन मिलेगी। वहीं अगर नई पेंशन योजना के हिसाब से देखें तो उस शिक्षक को बमुश्किल 800 से एक हजार रुपये की ही पेंशन मिलेगी। वहीं नई योजना में रिटायरमेंट के बाद निश्चित पेंशन की गारंटी नहीं होती। पुरानी स्कीम में रिटायर्ड कर्मचारी की मृत्यु होने पर उसके परिजनों को पेंशन की राशि मिलती है। -प्रियंका सौरभ पुरानी पेंशन योजना पर विवाद ...
भारत के आर्थिक विकास में भारतीय नागरिकों का है भरपूर योगदान

भारत के आर्थिक विकास में भारतीय नागरिकों का है भरपूर योगदान

BREAKING NEWS, TOP STORIES, आर्थिक, समाचार
प्रत्येक वर्ष भारतीय संसद में बजट प्रस्तुत किए जाने के एक दिन पूर्व देश का आर्थिक सर्वेक्षण माननीय वित्त मंत्री द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। देश की आर्थिक स्थिति के सम्बंध में गहराई से अध्ययन करने के उपरांत यह आर्थिक सर्वेक्षण संसद में पेश किया जाता है। दिनांक 31 जनवरी 2023 को भारत की वित्त मंत्री माननीया श्रीमती निर्मला सीतारमन द्वारा वर्ष 2022-23 का आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया गया। इस वर्ष के आर्थिक सर्वेक्षण में भारत की आर्थिक स्थिति के सम्बंध में कई ऐसी जानकारीयां उभरकर सामने आई हैं, जिनसे भारतीय नागरिकों को संतोष प्राप्त होगा। कोरोना महामारी एवं रूस यूक्रेन युद्ध के चलते वैश्विक स्तर पर लगभग सभी देशों ने गम्भीर आर्थिक समस्याओं का सामना किया है। परंतु, यह सुखद तथ्य उभरकर सामने आया है कि भारतीय नागरिकों के सहयोग से भारत ने इन आर्थिक समस्याओं का सामना बहुत सहज तरीके से किया है जिससे इ...
भारत : इंसाफ़ से पीड़ित बचपन

भारत : इंसाफ़ से पीड़ित बचपन

BREAKING NEWS, TOP STORIES, सामाजिक
भारत सरकार ने संसद में यह जानकारी देते हुए हाथ खड़े कर दिए हैं कि देश भर में बच्चों के खिलाफ अपराध की धाराओं के तहत दर्ज पचास हजार से ज्यादा मामलों में बच्चों को न्याय का इंतजार है। किसी भी देश और समाज में अपराधों पर काबू पाने की कड़ी व्यवस्था के बावजूद अगर आपराधिक घटनाओं पर लगाम नहीं लग पाती, तो यह सरकार और तंत्र की नाकामी का ही सबूत कहा जाएगा है। जिस देश में बच्चों के खिलाफ न सिर्फ अपराध की घटनाएं लगातार जारी हों, और उनमें न्याय मिलने की दर भी काफी धीमी हो तो यह एक बेहद अफसोसनाक स्थिति है। इसे देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ ही कहा जा सकता है। सबको पता है कि हमारे देश में बच्चों के बहुस्तरीय उत्पीड़न और उनके यौन शोषण जैसे अपराधों की रोकथाम में जब पहले के बनाए गए कानूनी प्रावधान नाकाफी साबित हुए, तब पाक्सो यानी यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम जैसी विशेष व्यवस्था की गई। इसके विपर...
राजनीति के मूल प्रवाह से अनभिज्ञ छुटभैयों की टिप्पणियाँ

राजनीति के मूल प्रवाह से अनभिज्ञ छुटभैयों की टिप्पणियाँ

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-प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकजसोवियत संघ से लेनिन और स्तालिन की बकवास की दयनीय नकल कर स्वयं को बौद्धिक मान बैठे छुटभैये राजनीति को विचारधाराओं की लड़ाई माने रहते हैं। ऐसे बहुत से रोचक जीव हैं जो कम्युनिस्ट या सोशलिस्ट रहने के दौरान अथवा संघ के स्वयंसेवक रहने के दौरान वैचारिक मतवादों की दुनिया मंे जीते रहे हैं। उनके लिये वैचारिक शुद्धता का आग्रह उतना ही महत्वपूर्ण है जितना अध्यात्मिक शुद्धता का आग्रह साधना के मार्ग में महत्वपूर्ण होता है। ऐसे लोग पहले तो भाजपा को हिन्दुत्व की पार्टी मान बैठे, जबकि भाजपा ने कभी भी ऐसी कोई घोषणा नहीं की। परन्तु घोषणा न करने को उसकी बहुत बड़ी रणनीति मानते रहे और अब हिन्दुत्व से विचलित भाजपा शासन को देखकर इतने बौखलाये रहते हैं कि उनके क्षोभ का लाभ कांग्रेस उठा ले तो उठा ले या राष्ट्र की विरोधी शक्तियाँ लाभ उठा लें तो उठा लें। उनकी अपनी एक दुनिया है। परन्तु राजनीति...
मौसम का बदलता मिज़ाज -ख़तरे की घंटी

मौसम का बदलता मिज़ाज -ख़तरे की घंटी

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बीते कल भुज का तापमान 39 डिग्री था, मौसम विज्ञान की भाषा में अरब सागर में बने प्रति चक्रवात के कारण ऐसा हुआ।समझने की जरूरत है कि ग्लोबल वार्मिंग की तपिश हमारे घर में भी दस्तक देने लगी है। फरवरी मध्य में यदि मार्च-अप्रैल जैसी गर्मी महसूस की जा रही है तो यह आसन्न खतरे का संकेत है। ऐसी स्थितियां पिछले साल भी पैदा हुई थीं,जब भरपूर फसल के बावजूद बालियों में गेहूं का दाना कम निकला था। घटी हुई उत्पादकता के कारण किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा था। इस बार भी किसान के माथे पर चिंता की लकीरें है। कहां तो किसान बंपर गेहूं की पैदावार की उम्मीद में आत्ममुग्ध था, वहीं ताप वृद्धि से अब उसकी फिक्र बढ़ गई है। साफ़ दिख रहा है विश्वव्यापी ग्लोबल वार्मिंग अपने घातक प्रभावों के साथ पूरे दुनिया में खाद्य सुरक्षा को संकट में डाल रही है। कई देशों में लगातार सूखे की स्थिति है तो कुछ जगह बाढ़ का प्रकोप है।...
क्यों झेल रही निराशा, स्वास्थ्य कार्यकर्ता आशा?

क्यों झेल रही निराशा, स्वास्थ्य कार्यकर्ता आशा?

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आशा कार्यकर्ता अपने निर्दिष्ट क्षेत्रों में घर-घर जाकर बुनियादी पोषण, स्वच्छता प्रथाओं और उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में जागरूकता पैदा करते हैं। वे मुख्य रूप से यह सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं कि महिलाएं प्रसव पूर्व जांच कराती हैं, गर्भावस्था के दौरान पोषण बनाए रखती हैं, स्वास्थ्य सुविधा में प्रसव कराती हैं, और बच्चों के स्तनपान और पूरक पोषण पर जन्म के बाद का प्रशिक्षण प्रदान करती हैं। फिर भी आशा को श्रमिकों के रूप में मान्यता नहीं दी जाती है और इस प्रकार उन्हें प्रति माह 18,000 रुपये से कम मिलता है। वे भारत में सबसे सस्ते स्वास्थ्य सेवा प्रदाता हैं। प्रोत्साहन राशि की प्रतिपूर्ति में देरी से आशा कार्यकर्ताओं के आत्म-सम्मान को ठेस पहुंची है और इसका असर उनके सेवा वितरण पर पड़ा है। केवल सामुदायिक स्वास्थ्य देखभाल और संबंधित कार्यों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, उन पर सर्...