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पुस्तकें हर आंधी में टीकी रहेगी

पुस्तकें हर आंधी में टीकी रहेगी

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विश्व पुस्तक दिवस-23 अप्रैल, 2022पुस्तकें हर आंधी में टीकी रहेगी-ललित गर्ग -हर साल 23 अप्रैल को दुनियाभर में विश्व पुस्तक दिवस के रूप में मनाया जाता है, इसे कॉपीराइट डे भी कहा जाता है। इस दिवस को किताबें पढ़ने, प्रकाशन और कॉपीराइट के लाभ को पहचानने और बढ़ावा देने के लिए मनाया जाता है। इस दिन कई विश्वप्रसिद्ध लेखकांे का जन्मदिवस या पुण्यतिथि होती है। विलियम शेक्सपियर, मिगुएल डे सर्वेंट्स और जोसेप प्लाया का इसी दिन निधन हुआ था, जबकि मैनुएल मेजिया वल्लेजो और मौरिस ड्रून इसी दिन पैदा हुए थे। यूनेस्कों ने 23 अप्रैल 1995 को इस दिवस को मनाने की शुरुआत की थी। पैरिस में यूनेस्को की एक आमसभा में फैसला लिया गया था कि दुनियाभर के लेखकों का सम्मान करने, उनको श्रद्धांजली देने और किताबों के प्रति रुचि जागृत करने के लिए इस दिवस को मनाया जाएगा। सर्वविदित है कि पुस्तक का महत्व सार्वभौमिक, सार्वकालिक एवं सार्...
पृथ्वी हर आदमी की जरूरत को पूरा कर सकती है, लालच को नहीं।

पृथ्वी हर आदमी की जरूरत को पूरा कर सकती है, लालच को नहीं।

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पृथ्वी हर आदमी की जरूरत को पूरा कर सकती है, लालच को नहीं। -प्रियंका 'सौरभ' महात्मा गांधी ने एक बार कहा था - पृथ्वी हर आदमी की जरूरत को पूरा करने के लिए पर्याप्त प्रदान करती है, लेकिन हर आदमी के लालच को नहीं। पिछले 25 वर्षों में मनुष्यों ने पृथ्वी के दसवें भाग के जंगल को नष्ट कर दिया है और यदि प्रवृत्ति जारी रहती है तो एक सदी के भीतर कोई भी शेष नहीं रह सकता है।  मनुष्य पृथ्वी पर सभी बायोमास का केवल 0.01% हिस्सा है, लेकिन ग्रह का इतना छोटा हिस्सा होने के बावजूद, उन्होंने सभी जंगली स्तनधारियों के 83% और सभी पौधों के आधे का विनाश किया है। हमें खुद को यह याद दिलाने की आवश्यकता है कि हमें अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए अपने पर्यावरण की रक्षा और सुरक्षा करनी चाहिए। इसी दृष्टि से प्रत्येक वर्ष 22 अप्रैल को अंतर्राष्ट्रीय पृथ्वी दिवस के रूप में मनाया ...
साम्प्रदायिक आग्रहों की चौड़ी होती खाइयां

साम्प्रदायिक आग्रहों की चौड़ी होती खाइयां

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साम्प्रदायिक आग्रहों की चौड़ी होती खाइयां -ललित गर्ग- समस्याएं अनेक हैं। बात कहां से शुरू की जाए। खो भी बहुत चुके हैं और खोने की रफ्तार तीव्र से तीव्रत्तर होती जा रही है। जिनकी भरपाई मुश्किल है। भाईचारा, सद्भाव, निष्ठा, विश्वास, करुणा यानि कि जीवन मूल्य खो रहे हैं। मूल्य अक्षर नहीं होते, संस्कार होते हैं, आचरण होते हैं। हम अपने आदर्शों एवं मूल्यों को खोते ही जा रहे हैं, एक बार फिर रामनवमी और हनुमान जयंति के अवसरों पर देश के कई प्रदेशों में हिंसा, नफरत, द्वेष और तोड़-फोड़ के दृश्य देखे गए। उत्तर भारत के प्रांतों के अलावा ऐसी घटनाएं दक्षिण और पूर्व के प्रांतों में भी हुईं। ऐसे सांप्रदायिक दंगें और खून का बहना कांग्रेस के शासन में होता रहा, लेकिन पिछले एक दशक में ऐसी हिंसात्मक साम्प्रदायिक घटनाएं पहली बार कई प्रदेशों में एक साथ हुई है, ऐसा होना काफी चिंता का विषय है। उन्माद, अविश्वास, राजनैति...
चीन-पाकिस्तान से निपटने के लिए हमें सीमाओं को मजबूत रखना होगा।

चीन-पाकिस्तान से निपटने के लिए हमें सीमाओं को मजबूत रखना होगा।

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चीन-पाकिस्तान से निपटने के लिए हमें सीमाओं को मजबूत रखना होगा। -सत्यवान 'सौरभ' 1970 और 80 के दशक में चीन और पाकिस्तान के बीच संबंध विकसित हुए। इनसे मुकाबला करना भारत की पहल था। चीन-पाकिस्तान की धुरी दो मोर्चों पर युद्ध की संभावना को खोलता है, इसलिए  भारत को सीमाओं पर अपने सुरक्षा तंत्र को मजबूत रखना अत्यंत जरुरी है। कुछ समय पहले तक, दो मोर्चों पर युद्ध की बातों ने दो परस्पर विरोधी मतों को जन्म दिया। मगर भारत की सेना का दृढ़ मत था कि चीन-पाकिस्तान सैन्य खतरा एक वास्तविक संभावना है, और हमें इस चुनौती का मुकाबला करने के लिए क्षमताओं का विकास करना चाहिए। दूसरी ओर, सामान्य रूप से राजनीतिक वर्ग और देश के रणनीतिक समुदाय के मुख्य वर्ग ने महसूस किया कि अतिरिक्त संसाधनों और धन के लिए दबाव बनाने के लिए सेना द्वारा दो-मोर्चे के खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि ऐतिहासिक र...
जहांगीरपुरी बवाल में बांग्लादेशियों के ‘हाथ’ को भी देखिए

जहांगीरपुरी बवाल में बांग्लादेशियों के ‘हाथ’ को भी देखिए

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जहांगीरपुरी बवाल में बांग्लादेशियों के ‘हाथ’ को भी देखिए  आर.के. सिन्हा इंदिरा गांधी ने 1975 में देश में इमरजेंसी लगाई तो उस दौर में राजधानी दिल्ली में झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले हजारों लाखों लोगों को उनके घरों से उजाड़कर अलग-अलग जगहों में बसाया गया था। उसमें उत्तर-पश्चिम दिल्ली का जहांगीरपुरी नाम का इलाका भी था। उसे इन अभागे लोगों के लिए ही बसाया गया। इधर मुख्य रूप से नई दिल्ली तथा साउथ दिल्ली की मलिन बस्तियों में रहने वालों को उठाकर ले जाया गया था। ये अधिकतर वाल्मिकी या धोबी समाज से थे। वक्त बदला तो जहांगीरपुरी में आबादी का चरित्र बदलने लगा। यहां पर ज्यादातर आ गए बांग्लादेशी मुसलमान। ये यहां पर कच्ची शराब बनाने से लेकर सट्टेबाजी के धंधे में लग गए। इन्होंने कभी शांत समझे जाने वाले जहांगीरपुरी में छोटे-मोटे अपराध करने भी शुरू कर दिए। जहांगीरपुरी में रोज क्लेश होने लगा। इनकी आबादी तेज...
क्या भारत व दुनिया सूखे की ओर बढ़ रहे है? – अनुज अग्रवाल

क्या भारत व दुनिया सूखे की ओर बढ़ रहे है? – अनुज अग्रवाल

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क्या भारत व दुनिया सूखे की ओर बढ़ रहे है? - अनुज अग्रवाल मध्य मार्च से ही देश के दो तिहाई हिस्से में औसत तापमान 6 से 8 डिग्री तक ज़्यादा चल रहा है। लगातार बढ़ती तपिश ने रबी की फसलों को एक महीने पहले ही पका दिया या जला दिया। फल व सब्ज़ियों की एक पूरी फसल ही निबट चुकी है। गेहूं छोटे व हल्के पैदा हुए और कुल फसल अलग अलग क्षेत्रों में दस से तीस प्रतिशत तक कम पैदा हुई है। यही हाल सरसों का है। गेहूँ के निर्यात को उत्सुक भारत सरकार अब कितनी फसल बचा पाती है यह वक़्त ही बताएगा क्योंकि गर्मी से पहले की इस गर्मी ने सबकी गर्मी निकाल दी है और अभी मई और जून की गर्मी व जुलाई ,अगस्त व सितंबर की उमस भी बाक़ी है।यूँ तो मौसम विभाग कह रहा है कि देश में सामान्य मानसून रहेगा किंतु यह बात छुपा दी कि ऐसा कई बार होगा कि ढेर सारी बारिश कुछ ही समय में ताबड़तोड़ तरीक़े से ही हो जाएगी व बड़ा समय सूखा ही निकल जाएगा।...
Science and technology for rural development

Science and technology for rural development

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The nationwide “Panchayati Raj Diwas” celebrations coming up on April 24 would have a significant scientific touch to them. The office of Principal Scientific Advisor to the Government of India and the various science and technology organisations working under the Department of Science & Technology, Council of Scientific and Industrial Research, Department of Biotechnology, Department of Space, Department of Atomic Energy, and Ministry of Earth Sciences would put up about 30 stalls at the exhibition to be held up as part of the function where Prime Minister, Narendra Modi, would inaugurate the programme. They will display the latest technologies and innovations beneficial for rural areas and farming. Union Minister of State (Independent Charge) Science & Technology; Minis...
शहबाज शरीफ का कश्मीर राग दुर्भाग्यपूर्ण

शहबाज शरीफ का कश्मीर राग दुर्भाग्यपूर्ण

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शहबाज शरीफ का कश्मीर राग दुर्भाग्यपूर्ण - ललित गर्ग- पाकिस्तान में एक और सत्ता की तख्ता पलट का नाटक पूरी दुनिया ने देखा। सत्ता में बने रहने के इमरान खान के सारे दांवपेच बेकार साबित हुए। शनिवार देर रात नेशनल असेंबली में बहुमत खो देने के बाद सरकार गिर गई। फिलहाल विपक्ष जीत गया है। सत्ता की कमान अब देश के मंजे हुए राजनेता शाहबाज शरीफ के हाथों में आ गई है। वे तीन बार पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और नवाज शरीफ की गैरमौजूदगी में पार्टी की अगुआई करते रहे हैं। पाकिस्तान के इस घटनाक्रम के बाद देश के राजनेताओं में ज्यादा समझदारी आएगी या दिशाशून्य हो जायेंगे? मालूम नहीं। पक्ष एवं विपक्ष का यह सारा शोर दूसरे को दोषी ठहराने का था और चुप्पी अपने दामन के दाग छिपाने की थी। यह घटनाक्रम सिर्फ किसी को सत्ता से बेदखल करने और किसी को सत्ता हासिल होने के संदर्भ में ही नहीं देखा जाना चाहिए। इसमें इम...
जलियांवाला बाग हत्याकांड भारत में ब्रिटिश शासन की क्रूरता और दमनकारी प्रकृति का प्रतीक है।

जलियांवाला बाग हत्याकांड भारत में ब्रिटिश शासन की क्रूरता और दमनकारी प्रकृति का प्रतीक है।

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(आधुनिक इतिहास के खूनी नरसंहारों में से एक ) जलियांवाला बाग हत्याकांड भारत में ब्रिटिश शासन की क्रूरता और दमनकारी प्रकृति का प्रतीक है। - सत्यवान 'सौरभ' जलियांवाला बाग नरसंहार, जिसे अमृतसर का नरसंहार भी कहा जाता है, एक ऐसी घटना थी जिसमें ब्रिटिश सैनिकों ने पंजाब के अमृतसर में जलियांवाला बाग के नाम से जाने जाने वाले खुले स्थान में निहत्थे भारतीयों की एक बड़ी भीड़ पर गोलीबारी की थी। जलियांवाला बाग हत्याकांड,13 अप्रैल, 1919, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। उस दिन पंजाब और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में लोकप्रिय फसल उत्सव बैसाखी थी। अमृतसर में स्थानीय निवासियों ने उस दिन एक बैठक आयोजित करने का फैसला किया, जिसमें सत्य पाल और सैफुद्दीन किचलू, स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले दो नेताओं और रॉलेट एक्ट के कार्यान्वयन के खिलाफ चर्चा और विरोध किया गया, जिसने ब्रिटिश सरकार को बिना...
भारत छोड़ो आंदोलन, पूर्ण स्वतंत्रता के विरोधी, दबे-कुचले वर्गों के मसीहा अंबेडकर

भारत छोड़ो आंदोलन, पूर्ण स्वतंत्रता के विरोधी, दबे-कुचले वर्गों के मसीहा अंबेडकर

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भारत छोड़ो आंदोलन, पूर्ण स्वतंत्रता के विरोधी, दबे-कुचले वर्गों के मसीहा अंबेडकर ( अम्बेडकर जी ने कांग्रेस के पूर्ण स्वतंत्रता के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। उन्होंने दलितों के उत्थान हेतु उच्च वर्गीय हिन्दुओं से ज़्यादा अंग्रेज़ों को सहायक माना। देश व दलितों के हितो के बीच टकराव की स्थिति में उन्होंने दलितों के हितों को वरीयता देने की बात कही। ) -प्रियंका 'सौरभ' देश बी आर अंबेडकर की 131वीं जयंती मना रहा है। एक समाज सुधारक, भारतीय संविधान की मसौदा समिति के अध्यक्ष और देश के पहले कानून मंत्री के रूप में उनकी भूमिका प्रसिद्ध है। वे एक प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री, सक्रिय राजनेता, प्रख्यात वकील, श्रमिक नेता, महान सांसद, अच्छे विद्वान, मानवविज्ञानी, वक्ता थे। आजादी के 75 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में देश ने आजादी का अमृत महोत्सव की शुरुआत की है। अम्बेडकर के विचारों की गंभीरता, राष्ट्र-निर्माता के...